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श्री रंगलक्ष्मी आदर्श संस्कॄत महाविघालय, वॄन्दावन(मथुरा)


उत्तर भारत में श्रुतिस्मॄति सिद्ध् विशिष्टाद्वैतदर्शन के प्रचार प्रसार का प्रमुख केन्द्र श्रीधाम वॄन्दावन स्थित श्रीरंगमन्दिर है। इस दिव्य देश(मन्दिर) की स्थापना परमपूज्य अनन्त श्रीविभूषित श्रीरंगदेशिक स्वामी जी महराज(गोवर्धन पीठाधीश्वर) द्वारा संवत् 1904 में की गई। उनके विद्वत् प्रवर शिष्यौ-श्री सुदर्शनाचार्य, श्रीलक्ष्मणाचर्य, गोविन्ददास आदि ने महराजश्री से निवेदन किया कि गुरुमाताजी श्रीलक्ष्मीअम्बा की स्मॄति सदा बनी रहे और सुधीजनौ को श्रुति दुग्धामॄता सदा प्राप्त होता रहे इसके लिए एक संस्कॄत महाविघालय की माताजी के नाम से स्थापना हो यह हमारी अभिलाषा है। श्रीस्वमीजी महाराज की अनुमति मिलने पर विक्रम संवत् 1906 में श्री रंगलक्ष्मी संस्कॄत महाविघालय की स्थपना की गई। आज यह भारत सरकार की आदर्श योजना में गॄहीत है।

इस प्रकार लगभग 150 वर्षो से यह महाविघालय निरन्तर संस्कॄत संस्कॄति एवं दर्शन के प्रचार प्रसार मे निरत है।.


अनेक विशिष्ट विद्वानो ने महाविघालय के प्रधानाचार्य(प्राचार्य) पद पर सेवा करते हुए इस महाविघालय की वॄद्धि की है। इनमें-


श्री सुदर्शनाचार्य शास्त्रीजी महाराज, श्रीगरुड़ध्वजाचार्य जी, श्रीअमोलकरामजी शास्त्रीजी, श्रीसीतारामाचार्यजी,श्रीरामलखनजी पाण्डेय(इन्ही के कार्यकल मे भारत सरकार ने महाविघालय को आदर्श योजना मे ग्रहण किया) डाँ. मुरारी लाल जी चतुर्वेदी। वर्तमान् समय मे डाँ. रामकॄपाल त्रिपठी तन मन धन से विघालय की सर्वागीण उन्नति में संलग्न है। इस लम्बे अन्तराल के बीच-बीच में कार्यवाहक प्राचार्य पद पर कार्य करने वाले महानुभाव है- श्रीरासबिहारी लाल जी गोस्वामी, श्रीसदाशिवजी शास्त्री, श्रीहीरालालजी शास्त्री, श्रीप्राणगोपालाचार्यजी, श्रीरामसुदर्शनजी मिश्र आदि।
श्रीरंगमन्दिर ट्रस्ट बोर्ड के वर्तमान अध्यक्ष अनन्त श्रीविभूषित स्वामी श्रीगोवर्धन रंगाचार्यजी महाराज गोवर्धन पीठाधीश्वर के वरदहस्त की छ्त्र छाया मे श्रीगोदारंगमन्नार भगवान की कॄपा से वर्तमान समय मे यह महाविघालय अपने लक्ष्य की ओर निरन्तर अग्रसर हो रहा है।
महाविघालय सम्पूर्णानन्द संस्कॄत विश्वविघालय से सम्बद्ध है तथा व्याकरण, साहित्य, वेदान्त एवं न्याय, दर्शन विषयों की शास्त्री एवं आचार्य की मान्यता प्राप्त है। श्री रंगलक्ष्मी आदर्श संस्कॄत विघालय(माध्यामिक) पॄथक रुप से संचालित है।
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